कलेक्टर पद्मिनी भोई साहू ने रामनामी समाज के वरिष्ठजनों का किया सम्मान, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता डॉक्यूमेंट्री का हुआ प्रदर्शन
सारंगढ़-बिलाईगढ़ कलेक्टर पद्मिनी भोई साहू ने सरसीवा थिएटर में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित रामनामी समुदाय पर आधारित डॉक्यूमेंट्री के प्रदर्शन कार्यक्रम में शामिल होकर समाज के वरिष्ठजनों का शॉल, श्रीफल और रामायण ग्रंथ भेंटकर सम्मान किया। कार्यक्रम में पुलिस अधीक्षक सुनील शर्मा, जनप्रतिनिधि, अधिकारी और बड़ी संख्या में रामनामी समाज के सदस्य मौजूद रहे।
डॉक्यूमेंट्री में दिखी रामनामी समाज की सांस्कृतिक विरासत
कार्यक्रम में प्रदर्शित राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता डॉक्यूमेंट्री में रामनामी समाज की संस्कृति, परंपरा, आस्था और जीवन मूल्यों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। उपस्थित लोगों ने फिल्म के माध्यम से समाज की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को करीब से जाना।
कलेक्टर ने किया वरिष्ठजनों का सम्मान

डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शन के बाद कलेक्टर पद्मिनी भोई साहू ने रामनामी समाज के वरिष्ठजनों को शॉल, श्रीफल एवं रामायण ग्रंथ भेंटकर सम्मानित किया। इस अवसर पर समाज की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण और नई पीढ़ी तक इसकी परंपराओं को पहुंचाने के महत्व पर भी जोर दिया गया। रामनामी समाज छत्तीसगढ़ की एक अनूठी धार्मिक एवं सामाजिक परंपरा है, जो अपनी 'राम नाम' के प्रति अटूट भक्ति और समानता के संदेश के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। इसकी स्थापना संत परशुराम (परसराम) ने लगभग 1890 के दशक में की थी।
रामनामी समाज की प्रमुख विशेषताएँ

शरीर पर 'राम' नाम अंकित करना: समाज के अनेक सदस्य अपने शरीर, माथे और कभी-कभी पूरे शरीर पर 'राम' शब्द गुदवाते हैं। यह उनकी आजीवन भक्ति और आस्था का प्रतीक है।
मूर्ति पूजा के बजाय 'राम नाम' की उपासना:
उनका विश्वास है कि ईश्वर हर जगह हैं, इसलिए वे राम नाम का जप और भजन को सर्वोच्च मानते हैं। रामनामी चादर: वे सफेद वस्त्र या चादर पहनते हैं जिस पर बार-बार "राम" लिखा होता है।
मोरपंख मुकुट: धार्मिक आयोजनों और भजन के समय मोरपंख से सजा मुकुट धारण करते हैं।
भजन और सत्संग: रामचरितमानस का पाठ, रामधुन और सामूहिक भजन इनके धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
Ramnami Community इतिहास

कहा जाता है कि उस समय जातिगत भेदभाव के कारण समाज के कुछ लोगों को मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता था। इसके विरोध और अपनी भक्ति को प्रकट करने के लिए संत परशुराम ने अपने शरीर पर 'राम' लिखवाया और संदेश दिया कि "जब मंदिर में प्रवेश नहीं मिलेगा, तो अपना शरीर ही भगवान का मंदिर बना लेंगे।" यही विचार आगे चलकर रामनामी आंदोलन का आधार बना।
छत्तीसगढ़ में कहाँ रहते हैं?
रामनामी समाज मुख्य रूप से सारंगढ़-बिलाईगढ़, जांजगीर-चांपा, रायगढ़, बलौदाबाज़ार, महासमुंद, रायपुर तथा महानदी के मैदानी क्षेत्रों में निवास करता है।
सांस्कृतिक महत्व
छत्तीसगढ़ की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा।
भक्ति, समानता और सामाजिक न्याय का संदेश।
उनकी परंपरा को देश-विदेश के शोधकर्ताओं और पर्यटकों ने भी सराहा है।
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