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छत्तीसगढ़ में रंगों से पहले मिठास की रस्म; क्या आपने पहनी है बताशों वाली हरवा माला?

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Trips N Trippers Editorial
Published on • Raipur, India
छत्तीसगढ़ में रंगों से पहले मिठास की रस्म; क्या आपने पहनी है बताशों वाली हरवा माला?

छत्तीसगढ़ में होली का मतलब सिर्फ रंग, गुलाल और हुड़दंग नहीं है, बल्कि यहां इस त्यौहार की शुरुआत एक बेहद मीठी परंपरा से होती है। प्रदेश में सदियों से हरवा माला यानी शक्कर के बताशों से बनी खास माला पहनाकर होली का शुभारंभ किया जाता है। यह परंपरा केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे छत्तीसगढ़ी संस्कृति में प्रेम, सौहार्द और बड़ों के आशीर्वाद का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।

जहां देश के अन्य हिस्सों में लोग सीधे रंगों से खेलना शुरू करते हैं, वहीं छत्तीसगढ़ में पहले रिश्तों में मिठास घोली जाती है। हरवा माला की यह रस्म समाज को आपस में जोड़ने और भाईचारे का संदेश देने का काम करती है। यह परंपरा छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को पूरे देश में एक अलग और खास पहचान दिलाती है।

हरवा माला

छत्तीसगढ़ में रंगों से पहले मिठास की रस्म; क्या आपने पहनी है बताशों वाली हरवा माला? जानें इस अनोखी परंपरा का महत्व

रंगों से पहले मिठास की प्राचीन रस्म

पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा के अनुसार, होली के दिन सबसे पहले हरवा माला भगवान को अर्पित की जाती है। इसके बाद घर के बुजुर्ग बच्चों को यह माला पहनाकर उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। दोस्तों, रिश्तेदारों और यहाँ तक कि समधियों को भी यह माला पहनाकर होली की शुभकामनाएं देने का रिवाज है। माना जाता है कि जैसे बताशा मुँह में जाते ही घुल जाता है, वैसे ही इंसान को अपने मन की कड़वाहट भुलाकर प्रेम से त्यौहार मनाना चाहिए।

बच्चों के लिए मस्ती और स्वाद का संगम

होली के दिन छोटे बच्चों में हरवा माला को लेकर एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। बच्चे रंग-बिरंगी मालाएं गले में पहनकर मोहल्ले में घूमते हैं और बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं। खेल-कूद के बीच जब भी उन्हें भूख लगती है, वे गले से माला उतारकर उसे बड़े चाव से खाते हैं। गुलाबी, पीले और नीले रंगों में सजी ये मालाएं बच्चों के लिए होली का सबसे पसंदीदा हिस्सा होती हैं।

बाजारों में रौनक: महंगाई के बावजूद भारी डिमांड

बदलते समय के साथ हरवा माला का क्रेज कम नहीं हुआ है। इस साल बाजारों में इसकी अच्छी-खासी रौनक दिख रही है। हालांकि, महंगाई का असर यहां भी साफ नजर आ रहा है। वर्तमान में हरवा माला की कीमत करीब 120 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है। बाजारों में एक माला 20 से 40 रुपए तक बिक रही है, जिसे लोग अपनी श्रद्धा और जरूरत के अनुसार खरीद रहे हैं। दुकानदार बताते हैं कि आज भी लोग आधुनिक मिठाइयों के बजाय इस पारंपरिक 'हरवा' को ही प्राथमिकता दे रहे हैं।

लोक संस्कृति की अटूट पहचान

हरवा सिर्फ शक्कर की बनी मिठाई नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू और यहां के लोगों के सरल स्वभाव का आईना है। आधुनिकता की चकाचौंध में भले ही कई पुरानी रीतियां फीकी पड़ गई हों, लेकिन होली पर हरवा माला पहनाने का रिवाज आज भी हर घर में जिंदा है। यही वह मिठास है जो समाज को एक सूत्र में पिरोकर रखती है और त्यौहार की खुशी को दोगुना कर देती है।

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