माओवाद पर अंकुश के बाद पर्यटकों से गुलजार हुआ बस्तर
कभी बंदूक की आवाज और डर के साये में सिमटा बस्तर अब शांति, हरियाली और पर्यटन की नई कहानी कह रहा है। जिन जंगलों को लंबे समय तक माओवाद असुरक्षा से जोड़ा गया, वही जंगल आज सैलानियों के लिए सुकून और रोमांच का पता बनते जा रहे हैं। माओवाद पर प्रभावी नियंत्रण के बाद बस्तर ने न सिर्फ हालात बदले हैं, बल्कि अपनी पहचान भी नए सिरे से गढ़ी है।
घने जंगल, ऊंचे पहाड़, झरनों की गूंज और आदिवासी संस्कृति की सरलता अब देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर रही है। बस्तर की यह बदली हुई तस्वीर उस भरोसे की गवाही है, जो वर्षों बाद यहां की जमीन पर लौटा है।
नए साल में पर्यटन का उत्सव
नववर्ष 2025 की छुट्टियों में बस्तर का नजारा किसी उत्सव से कम नहीं रहा। होटल, रिसॉर्ट और आदिवासी होम-स्टे पूरी तरह भरे दिखे। चित्रकोट और तीरथगढ़ जैसे झरनों पर सैलानियों की चहल-पहल रही और हर तरफ कैमरे क्लिक करते नजर आए। सिर्फ दस दिनों में करीब 40 हजार पर्यटकों का बस्तर पहुंचना इस बदलते माहौल का साफ संकेत है।
कोलकाता से आए रमन बनर्जी कहते हैं कि बस्तर को लेकर उनके मन में पहले डर था, लेकिन यहां पहुंचते ही सब कुछ बदल गया। शांति, स्वच्छता और लोगों की आत्मीयता ने उन्हें खासा प्रभावित किया। हैदराबाद से आए आर. सूर्य राव के लिए चित्रकोट और तीरथगढ़ देखना यादगार अनुभव रहा, जबकि फ्रांस से आए स्टीव बस्तर की जनजातीय संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य को अद्भुत बताते हैं।

झरनों और जंगलों ने बदली पहचान
चित्रकोट जलप्रपात, जिसे लोग अब इंडियन नियाग्रा कहने लगे हैं, बस्तर पर्यटन का सबसे बड़ा आकर्षण बन चुका है। तीरथगढ़, हांदावाड़ा, तामड़ा घुमर, मैदरी घुमर जैसे झरने, कोटमसर और कैलाश गुफाएं तथा कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान पर्यटकों को प्रकृति के करीब ले जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल होती इन जगहों की तस्वीरें और वीडियो युवाओं और विदेशी पर्यटकों को खास तौर पर आकर्षित कर रही हैं।
होम-स्टे और गांवों से जुड़ता पर्यटन
बस्तर में अब पर्यटन सिर्फ होटल और रिसॉर्ट तक सीमित नहीं रहा। घुड़मारास और मांझीपाल जैसे गांवों में आदिवासी होम-स्टे, बंबू राफ्टिंग और गांव आधारित पर्यटन नई पहचान बना रहे हैं। सैलानी यहां सिर्फ घूमने नहीं आते, बल्कि आदिवासी जीवन, भोजन और संस्कृति को करीब से महसूस करते हैं। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।
आंकड़े बोल रहे हैं बदलाव की कहानी
पर्यटन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि वर्ष 2017 में जहां बस्तर आने वाले पर्यटकों की संख्या करीब 1.25 लाख थी, वहीं 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर तीन लाख से अधिक पहुंच गया है। यह अब तक का सबसे बड़ा पर्यटन रिकॉर्ड है और उस भरोसे का प्रमाण भी, जो बस्तर ने दोबारा हासिल किया है।
माओवाद - शांति से विकास की ओर
राज्य सरकार बस्तर को माओवाद से सुरक्षित और आकर्षक पर्यटन गंतव्य के रूप में विकसित करने पर जोर दे रही है। पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिया गया है और इको-टूरिज्म, होम-स्टे तथा स्थानीय युवाओं को रोजगार से जोड़ने की योजनाओं पर काम चल रहा है।
बस्तर की कहानी अब डर और हिंसा की नहीं, बल्कि उम्मीद, सुकून और प्रकृति के साथ जुड़ाव की है। जिन जंगलों से कभी लोग घबराते थे, आज वही जंगल मुस्कुराते हुए पर्यटकों का स्वागत कर रहे हैं।
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