कांटों के झूले पर विराजीं मां काछनदेवी, फिर 75 दिन के बस्तर दशहरा को मिली अनुमति
बस्तर के ऐतिहासिक बस्तर दशहरा महापर्व की शुरुआत पारंपरिक पूजा विधान काछन गादी के साथ हुई। करीब सात सदियों पुरानी इस परंपरा में पनका समाज की नाबालिग कन्या पीहू ने मां काछनदेवी का स्वरूप धारण किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अनुष्ठान के दौरान देवी का वास कन्या के शरीर में होता है। इसके बाद उन्हें बेल के नुकीले कांटों से बने झूले पर लिटाया गया। इस रस्म के साथ मां काछनदेवी ने बस्तर राजपरिवार, क्षेत्र की जनता और प्रशासन को 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा के आयोजन की अनुमति प्रदान की।

काछन गादी से शुरू हुआ महापर्व का पारंपरिक विधान
बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट धार्मिक परंपराओं और जनजातीय संस्कृति के लिए देश-दुनिया में जाना जाता है। हर साल महापर्व की शुरुआत काछन गादी की रस्म से होती है। इस बार भी परंपरा के अनुसार पूजा विधान संपन्न किया गया।
अनुष्ठान के दौरान पीहू को मां काछनदेवी का स्वरूप मानकर बेल के कांटों से तैयार झूले पर लिटाया गया। इस दृश्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक जुटे। धार्मिक मान्यता के मुताबिक, देवी इस रस्म के माध्यम से महापर्व के आयोजन के लिए अपनी स्वीकृति देती हैं।

राजपरिवार ने मां काछनदेवी से लिया आशीर्वाद
अनुष्ठान के दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने मां काछनदेवी के समक्ष शीश झुकाकर आशीर्वाद लिया। इसके बाद वे गोलबाजार पहुंचे, जहां उन्होंने मिरगान समुदाय की इष्ट देवी मां रैला देवी की विधिवत पूजा-अर्चना की।
इन पारंपरिक रस्मों के संपन्न होने के दौरान काछन गुड़ी और गोलबाजार क्षेत्र में मोहरी बाजा की ध्वनि गूंजती रही। पूजा विधान में स्थानीय परंपराओं और धार्मिक आस्था की झलक देखने को मिली।
हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों की मौजूदगी
इस पारंपरिक आयोजन के साक्षी बनने के लिए बस्तर अंचल के श्रद्धालुओं के साथ स्थानीय जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और देश-विदेश से आए पर्यटक पहुंचे।
कार्यक्रम में सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, समिति के उपाध्यक्ष बलराम मांझी और महापौर संजय पाण्डे मौजूद रहे। इनके अलावा बस्तर कमिश्नर डोमन सिंह, आईजी बीएन मीणा, कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा भी शामिल हुए।
आयोजन में मांझी-चालकी, नाइक-पाइक, मेंबर-मेंबरिन, पुजारी, गायता और बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिकों की सहभागिता रही।
बस्तर की संस्कृति और सामूहिक आस्था का प्रतीक है दशहरा
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की जीवंत आदिवासी संस्कृति और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था का भी प्रतीक है। यह महापर्व बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को समर्पित है। इसकी विभिन्न रस्मों में क्षेत्र के अलग-अलग समुदायों की भागीदारी रहती है।
काछन गादी के साथ महापर्व के पारंपरिक पूजा विधान की शुरुआत हो चुकी है। अब आगामी 75 दिनों के दौरान बस्तर दशहरा से जुड़े विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और परंपराएं संपन्न होंगी।
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