21 साल से बंद मंदिर से हिडमा के गांव तक, 13 घंटे में 43 इंफ्लुएंसर्स ने देखा बदलता बस्तर
बस्तर के उन इलाकों में शुक्रवार को बदलाव की अलग तस्वीर दिखाई दी, जहां कभी नक्सल हिंसा और बारूदी सुरंगों का डर लोगों की जिंदगी का हिस्सा था। दिल्ली से आए 43 इंफ्लुएंसर्स ने सुकमा से जगरगुंडा, केरलापेंदा होते हुए पूवर्ती तक 13 घंटे से अधिक का सफर किया। इस दौरान उन्होंने पुनर्वास केंद्र में पूर्व नक्सलियों से संवाद किया, सुरक्षा व्यवस्था को समझा, 76 जवानों की शहादत से जुड़े क्षेत्र को देखा, ग्रामीणों से बात की, 21 साल से बंद श्रीराम मंदिर पहुंचे और अंत में नक्सली कमांडर हिडमा के पैतृक गांव पूवर्ती में उसके परिवार से मुलाकात की।

पुनर्वास केंद्र में पूर्व नक्सलियों से सीधा संवाद
सुकमा पहुंचने के बाद इंफ्लुएंसर्स ने सबसे पहले पुनर्वास केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने आत्मसमर्पण कर हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों से बातचीत की। उन्होंने उनके जीवन, आत्मसमर्पण के बाद आए बदलाव और सामान्य जिंदगी में लौटने के अनुभवों को समझा। इस संवाद के जरिए बस्तर के संघर्ष का एक मानवीय पक्ष उनके सामने आया।
पुलिस से समझी सुरक्षा और विकास की तस्वीर
इसके बाद दल ने सुकमा के पुलिस अधीक्षक से मुलाकात की। इंफ्लुएंसर्स ने क्षेत्र में सुरक्षा, शांति, विकास और प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने के प्रयासों के बारे में जानकारी ली। उन्होंने यह भी समझने की कोशिश की कि दूरस्थ इलाकों तक सुरक्षा के साथ नागरिक सुविधाओं और विकास की पहुंच किस तरह बढ़ रही है। सुकमा में दल ने साइंस पार्क का भी भ्रमण किया। इसके बाद सफर तोंगपाल की ओर बढ़ा और भोजन के बाद टीम जगरगुंडा के लिए रवाना हुई।

‘खूनी सड़क’ से गुजरा काफिला
इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वह रास्ता था, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘खूनी सड़क’ कहा जाता है। इसी मार्ग से गुजरते हुए इंफ्लुएंसर्स ने उस दौर के बारे में जाना, जब यह क्षेत्र नक्सली हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों का केंद्र रहा। जगरगुंडा में उन्हें उस इलाके के बारे में जानकारी दी गई, जो 2010 के ताड़मेटला हमले की स्मृति से जुड़ा है। 6 अप्रैल 2010 को हुए इस हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों की जान गई थी। यहां पहुंचकर इंफ्लुएंसर्स ने बस्तर के उस अतीत को करीब से समझा, जिसकी वजह से जगरगुंडा लंबे समय तक हिंसा की खबरों में रहा।
21 साल बाद फिर खुला श्रीराम मंदिर
जगरगुंडा से आगे दल केरलापेंदा पहुंचा। यहां ग्रामीणों से बातचीत के बाद इंफ्लुएंसर्स श्रीराम मंदिर पहुंचे। यह वही मंदिर है, जो माओवादी प्रभाव के दौर में करीब 21 वर्षों तक बंद रहा था। मंदिर में भगवान श्रीराम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित हैं। वर्ष 2003 में ग्रामीणों को मंदिर बंद रखने और पूजा-अर्चना नहीं करने का फरमान दिया गया था। इसके बाद भय के माहौल में लोग मंदिर के आसपास जाने से भी बचते थे। अप्रैल 2024 में परिस्थितियां बदलीं। सुरक्षा बलों की मौजूदगी और ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर की सफाई हुई। करीब 21 साल बाद मंदिर के कपाट फिर खुले। ग्रामीणों और सीआरपीएफ जवानों ने मिलकर परिसर की सफाई की और पूजा-अर्चना दोबारा शुरू हुई।
केरलापेंदा को माओवादी मुक्त गांव घोषित किया गया
केरलापेंदा का यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गांव कभी माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। वर्ष 2025 में यहां से 9 सहित कुल 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद केरलापेंदा को माओवादी मुक्त गांव घोषित किया गया था। इंफ्लुएंसर्स ने ग्रामीणों से बातचीत कर यह समझने की कोशिश की कि लंबे समय तक संघर्ष से प्रभावित रहे इलाके में सामान्य जीवन की वापसी का स्थानीय लोगों के लिए क्या अर्थ है।
रात में पहुंचे पूवर्ती, हिडमा के परिवार से मिले
केरलापेंदा के बाद दल पूवर्ती के लिए रवाना हुआ। जंगलों और दूरस्थ इलाकों से गुजरते हुए कई घंटे की यात्रा के बाद इंफ्लुएंसर्स रात में पूवर्ती पहुंचे। पूवर्ती नक्सली कमांडर हिडमा का पैतृक गांव है। यहां इंफ्लुएंसर्स ने हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से संवाद किया। परिवार से गांव की वर्तमान परिस्थितियों, स्थानीय जीवन और क्षेत्र में आए बदलावों के बारे में जानकारी ली। यह मुलाकात यात्रा का संवेदनशील पड़ाव रही। जिस नाम की पहचान देश में नक्सल हिंसा से जुड़ी रही, उसी व्यक्ति के पैतृक गांव में उसके परिवार से आमने-सामने बातचीत के जरिए इंफ्लुएंसर्स ने बस्तर की सामाजिक वास्तविकता को समझने की कोशिश की।
एक सफर में बस्तर के कई चेहरे
सुकमा से पूवर्ती तक इस यात्रा में बस्तर के कई अलग-अलग पहलू एक साथ सामने आए। पुनर्वास केंद्र में हिंसा का रास्ता छोड़ चुके लोगों से बातचीत हुई। पुलिस प्रशासन से सुरक्षा और विकास के प्रयासों की जानकारी मिली। जगरगुंडा में 76 जवानों की शहादत से जुड़ी स्मृतियां सामने आईं। इसके बाद केरलापेंदा में ग्रामीणों से संवाद हुआ और 21 साल बाद फिर खुले श्रीराम मंदिर को देखा गया। यात्रा के अंतिम हिस्से में पूवर्ती में हिडमा के परिवार से मुलाकात हुई। इस तरह 43 इंफ्लुएंसर्स ने बस्तर को सिर्फ पर्यटन स्थलों के जरिए नहीं देखा। वे उन गांवों और इलाकों तक पहुंचे, जिनकी पहचान लंबे समय तक राष्ट्रीय खबरों में हिंसा की घटनाओं से जुड़ी रही।
बस्तर के अतीत के बीच दिखता वर्तमान
इस पूरे सफर में बस्तर के अतीत और वर्तमान की कई तस्वीरें एक साथ दिखाई दीं। एक तरफ जगरगुंडा और शहादत से जुड़ी स्मृतियां थीं। दूसरी तरफ पुनर्वास केंद्र, ग्रामीण संवाद, विकास और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी तस्वीरें थीं। केरलापेंदा का 21 साल बाद खुला मंदिर इस बदलाव की सबसे अलग तस्वीरों में से एक रहा। जहां कभी भय के कारण पूजा बंद हो गई थी, वहीं अब मंदिर में पूजा दोबारा शुरू हो चुकी है।
सुकमा से जगरगुंडा, केरलापेंदा से पूवर्ती तक 43 इंफ्लुएंसर्स का यह सफर बस्तर के उन इलाकों की जमीनी तस्वीर सामने लाया, जिन्हें लंबे समय तक सिर्फ संघर्ष और हिंसा के संदर्भ में देखा गया। रात करीब 11 बजे दंतेवाड़ा पहुंचने तक इस दल के सामने बस्तर के अतीत और वर्तमान की कई तस्वीरें थीं।
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