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6 Mar

दुनिया ने खेली होली पर रायगढ़ के इस गांव में नहीं उड़ा गुलाल

पंचांग नहीं ‘दिन’ तय करता है त्यौहार!

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक ऐसा गांव है जहाँ होली की खुशियां पंचांग की तिथियों से नहीं, बल्कि सप्ताह के खास दिनों के अनुशासन से तय होती हैं। बरमकेला ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले साल्हेओना गांव में सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, होलिका दहन और रंगों का उत्सव केवल मंगलवार या शनिवार को ही मनाया जाता है, चाहे आधिकारिक तौर पर होली किसी भी दिन क्यों न पड़ रही हो।

यह अनोखी परंपरा छत्तीसगढ़ की उस समृद्ध और विविध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जो आधुनिक दौर में भी सामुदायिक एकता को बनाए रखने का काम करती है। साल्हेओना की यह रीत न केवल ग्रामीणों की अटूट आस्था का प्रमाण है, बल्कि यह दर्शाती है कि कैसे स्थानीय मान्यताएं और पूर्वजों के प्रति सम्मान आज भी सामाजिक ताने-बाने को मजबूती प्रदान करते हैं।

दुनिया ने खेली होली पर रायगढ़ के इस गांव में नहीं उड़ा गुलाल

पंचांग की गणना पर भारी पड़ती है सदियों पुरानी रीत

साल्हेओना गांव के निवासी पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ऐसे नियम का पालन कर रहे हैं जो बाहरी दुनिया के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं है। देशभर में जहाँ फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होलिका दहन की तैयारी होती है, वहीं इस गांव के लोग कैलेंडर की जगह ‘वार’ यानी दिन पर नजर रखते हैं। यदि मुख्य होली सोमवार को आती है, तो पूरा गांव संयम के साथ अगले दिन यानी मंगलवार का इंतजार करता है। इसी तरह यदि बुधवार को होली का मुहूर्त होता है, तो ग्रामीण शनिवार तक रुक जाते हैं। जब तक मंगलवार या शनिवार की विशेष घड़ी नहीं आती, तब तक गांव की गलियों में सन्नाटा पसरा रहता है और न तो कोई रंग खेलता है और न ही होलिका की पवित्र अग्नि प्रज्वलित की जाती है।

संकटों से मुक्ति के लिए पूर्वजों ने लिया था यह कठिन संकल्प

इस अनूठी परंपरा के पीछे ग्रामीणों का एक गहरा विश्वास और अनहोनी का डर छिपा हुआ है। गांव के बुजुर्गों और जानकारों की मानें तो दशकों पहले साल्हेओना गांव में भीषण आगजनी की घटनाएं और जानलेवा महामारियां फैली थीं, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। उस विकट परिस्थिति में गांव के पूर्वजों ने संकटमोचन हनुमान जी और न्याय के देवता शनि देव की शरण ली थी। उन्होंने संकल्प लिया था कि गांव की रक्षा और खुशहाली के लिए होली का पर्व केवल इन्हीं दो देवताओं के समर्पित दिनों यानी मंगलवार या शनिवार को ही मनाया जाएगा। तब से लेकर आज तक ग्रामीणों का मानना है कि इस नियम को तोड़ने पर गांव पर पुनः कोई बड़ी विपदा आ सकती है।

आधुनिकता और आस्था का अद्भुत संगम

इस प्रथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जब पूरी दुनिया होली के हुड़दंग और जश्न में डूबी होती है, तब साल्हेओना गांव में लोग पूरी तरह शांत रहते हैं और अपने दैनिक खेती-किसानी के कामों में व्यस्त रहते हैं। त्यौहार मनाने का दिन गांव की चौपाल पर होने वाली एक सामूहिक बैठक में तय किया जाता है, जिसमें पूरा गांव एक स्वर में निर्णय लेता है। हैरानी की बात यह है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट के इस दौर में भी गांव के शिक्षित युवा अपनी इस सांस्कृतिक विरासत को उसी शिद्दत और अनुशासन के साथ निभा रहे हैं जैसे उनके पूर्वज निभाया करते थे।

आगामी होली पर्व के लिए भी साल्हेओना के ग्रामीणों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं और वे उसी उत्साह के साथ उस ‘विशेष दिन’ का इंतजार कर रहे हैं जो उनके पूर्वजों ने तय किया था। यह परंपरा अब केवल एक गांव का त्यौहार नहीं रह गई है, बल्कि शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए भी जिज्ञासा का केंद्र बन गई है। रायगढ़ जिला प्रशासन और स्थानीय लोग इस सांस्कृतिक विशिष्टता को संजोए रखने की दिशा में काम कर रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी जड़ों से जुड़ी रहें।