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देश से 7 दिन पहले दिवाली मनाता है छत्तीसगढ़ का ये गांव, सिरदार देव की मान्यता जानकर रह जाएंगे हैरान

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Trips N Trippers Editorial
Published on • Raipur, India
देश से 7 दिन पहले दिवाली मनाता है छत्तीसगढ़ का ये गांव, सिरदार देव की मान्यता जानकर रह जाएंगे हैरान

जब देशभर में दीपावली की तैयारियां चल रही होती हैं, तब छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का सिरमा गांव अपना सबसे बड़ा त्योहार मना चुका होता है। यहां सदियों पुरानी परंपरा के तहत दीपावली समेत होली, हरियाली और पोला भी निर्धारित तारीख से सात दिन पहले मनाए जाते हैं। गांव में त्योहारों की तारीख तय करने के पीछे सिरदार देव के प्रति गहरी आस्था जुड़ी है। ग्रामीणों का मानना है कि उनके आराध्य देव की पूजा के बिना कोई भी उत्सव शुरू नहीं होता।

 

एक व्यक्ति की कुर्बानी से शुरू हुई सिरदार देव की मान्यता

सिरमा गांव के बुजुर्गों के मुताबिक, सैकड़ों साल पहले यह इलाका छोटे-छोटे घरों और घने जंगलों से घिरा हुआ था। उस समय जंगली जानवरों का खतरा बना रहता था और ग्रामीणों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता था।

इसी दौरान सिरदार नाम का एक व्यक्ति शिकार के सिलसिले में गांव पहुंचा। उसने ग्रामीणों को जंगली जानवरों से बचाने में मदद की। इस कोशिश में उसकी जान चली गई। इसके बाद गांव के लोगों ने उसे अपना रक्षक और मसीहा मान लिया। धीरे-धीरे सिरदार देव गांव के आराध्य और संरक्षक देवता के रूप में पूजे जाने लगे।

मुखिया को सपने में मिला था सात दिन पहले त्योहार मनाने का संदेश

ग्रामीणों की मान्यता है कि सिरदार देव ने गांव के मुखिया को सपने में दर्शन देकर सभी त्योहार सात दिन पहले मनाने का निर्देश दिया था। कहा जाता है कि इस परंपरा की अनदेखी करने पर गांव में विपत्तियां आ सकती हैं।

ग्रामीणों के अनुसार, शुरुआत में इस निर्देश का पालन नहीं किया गया तो गांव में बीमारियों और अकाल जैसी परेशानियां बढ़ने लगीं। इसके बाद लोगों ने सिरदार देव की मान्यता के अनुसार त्योहार मनाने का नियम अपना लिया। तभी से यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है।

सिरदार देव के मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित

सिरमा गांव की इस परंपरा का एक और खास पहलू है। यहां सिरदार देव के मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है। पूजा-अर्चना केवल पुरुष ही करते हैं। ग्रामीण इस नियम को अपने पूर्वजों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा मानते हैं।

गांव के सरपंच छविलेश कुमार सिन्हा के मुताबिक, त्योहारों की तैयारियां करीब 15 से 20 दिन पहले शुरू हो जाती हैं। दीपावली के अवसर पर आसपास के 15 से 20 गांवों से रिश्तेदार और मेहमान सिरमा पहुंचते हैं। दो दिनों तक गांव में मेले जैसा माहौल रहता है।

युवा पीढ़ी भी संभाल रही सैकड़ों साल पुरानी विरासत

आधुनिक दौर में भी सिरमा गांव के युवाओं का अपनी परंपरा से जुड़ाव बना हुआ है। गांव के युवा धनेन्द्र कुमार ध्रुवा बताते हैं कि यह प्रथा इतनी पुरानी है कि बुजुर्गों को भी इसकी शुरुआत का सटीक समय पता नहीं है।

इसके बावजूद नई पीढ़ी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। जहां समय के साथ कई पुरानी लोक परंपराएं पीछे छूट रही हैं, वहीं धमतरी का सिरमा गांव अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान को आज भी संभाले हुए है।

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