गुजरात में नया साल, पंजाब में बंदी छोड़ दिवस... भारत में दिवाली के ये रंग शायद नहीं जानते होंगे आप
दीपावली का नाम आते ही घरों में जगमगाते दीये, रंगोली और मां लक्ष्मी की पूजा की तस्वीर सामने आती है। लेकिन भारत के अलग-अलग राज्यों में इस त्योहार की परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं अलग हैं। उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी की खुशी में दीपोत्सव होता है, तो पंजाब में सिख समुदाय बंदी छोड़ दिवस मनाता है। पश्चिम बंगाल में मां काली की आराधना होती है और दक्षिण भारत में नरकासुर वध की मान्यता से जुड़ी परंपराएं निभाई जाती हैं। आइए जानते हैं, देश के आठ राज्यों में दीपावली किस तरह मनाई जाती है।
उत्तर प्रदेश और दिल्ली: भगवान श्रीराम की वापसी का उत्सव
उत्तर प्रदेश में दीपावली का संबंध भगवान श्रीराम के 14 वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटने से जुड़ा है। धार्मिक मान्यता है कि उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर पूरी नगरी को रोशन किया था। इसी परंपरा की झलक अयोध्या के भव्य दीपोत्सव में देखने को मिलती है, जहां लाखों दीये जलाए जाते हैं।
इस दिन घरों में मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है। लोग घरों को सजाते हैं, मिठाइयां बांटते हैं और उपहार देकर त्योहार की खुशियां साझा करते हैं।
पंजाब: दीपावली के साथ मनाया जाता है बंदी छोड़ दिवस
पंजाब में दीपावली का दिन सिख समुदाय के लिए भी विशेष महत्व रखता है। इसे बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाया जाता है। मान्यता के अनुसार, सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद सिंह जी ग्वालियर के किले से 52 राजाओं के साथ रिहा होकर अमृतसर लौटे थे।
इस अवसर पर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को रोशनी से सजाया जाता है। श्रद्धालु दीप जलाते हैं और इस ऐतिहासिक प्रसंग को याद करते हुए उत्सव मनाते हैं।
पश्चिम बंगाल और असम: मां काली की होती है आराधना
देश के कई हिस्सों में दीपावली पर मां लक्ष्मी की पूजा होती है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इस रात मां काली की आराधना का विशेष महत्व है। असम में भी काली पूजा की परंपरा प्रचलित है।
इस अवसर पर जगह-जगह पूजा पंडाल सजाए जाते हैं और मां काली की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा कर उनका आशीर्वाद लेते हैं।
तमिलनाडु और दक्षिण भारत: नरक चतुर्दशी का विशेष महत्व
दक्षिण भारत के कई हिस्सों में दीपावली का उत्सव नरक चतुर्दशी की परंपरा से जुड़ा है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर लोगों को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी।
इस दिन लोग सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करते हैं और नए कपड़े पहनते हैं। घरों के बाहर कोलम यानी पारंपरिक रंगोली बनाई जाती है। इसके बाद पूजा-अर्चना होती है और घरों में तरह-तरह के पकवान तैयार किए जाते हैं।
महाराष्ट्र: वसुबारस पर होती है गाय और बछड़े की पूजा
महाराष्ट्र में दीपावली से जुड़ी परंपराओं में वसुबारस का खास स्थान है। इस दिन विवाहित महिलाएं गाय और उसके बछड़े की पूजा करती हैं। इसे परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है।
त्योहार के दौरान घरों के दरवाजों पर तोरण लगाए जाते हैं, रंगोली बनाई जाती है और पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं।
गुजरात: चोपड़ा पूजा के साथ नए साल की शुरुआत
गुजरात में दीपावली केवल रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि नए साल के आगमन का अवसर भी है। यहां व्यापारी अपने पुराने बही-खातों की पूजा करते हैं। इस रस्म को चोपड़ा पूजा कहा जाता है।
मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए घरों के बाहर रंगोली बनाई जाती है। कई घरों में देवी के पदचिह्न भी बनाए जाते हैं। पारंपरिक पकवानों और पूजा-पाठ के बीच लोग नए साल का स्वागत करते हैं।
ओडिशा: दीपावली पर पूर्वजों को किया जाता है याद
ओडिशा में दीपावली के दौरान बड़ बड़ुआ डाका की परंपरा निभाई जाती है। इस अवसर पर लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं।
इस परंपरा में दीपावली का उत्सव केवल रोशनी और खुशियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान और पारिवारिक विरासत को याद करने का अवसर भी बनता है।
बिहार: दिवाली पर घरौंदा बनाने की परंपरा
बिहार में दीपावली के मौके पर घरों को सजाने और पकवान बनाने के साथ घरौंदा तैयार करने की भी परंपरा है। घरौंदा मिट्टी या अन्य सामग्री से बनाया जाने वाला छोटा-सा घर होता है।
इसे परिवार में सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना से जोड़ा जाता है। बच्चे और परिवार के दूसरे सदस्य मिलकर इसे सजाते हैं। इस तरह घरौंदा दीपावली के उत्सव में एक खास रंग भर देता है।
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